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नेट न्यूट्रैलिटी पर मचे ताजा हंगामे ने निर्विवाद रूप से इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की आवाज और ताकत प्रदर्शित की है। यही वजह है कि फ्लिपकार्ट को भी एयरटेल के साथ अपना करार खत्म करना पड़ा। मौजूदा विवाद का जन्म एक सांविधानिक प्राधिकरण के परामर्श पत्र जारी करने के फैसले से हुआ है। यह प्राधिकरण है, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई), जिसने बीते 27 मार्च को अपनी वेबसाइट पर चुपचाप बिना किसी घोषणा के यह परामर्श पत्र जारी किया। इस पत्र का शीर्षक है-कन्सल्टेशन पेपर ऑन रेगुलेटरी फ्रेमवर्क फॉर ओवर-द-टॉप (ओटीटी) सर्विसेज। यह परामर्श पत्र इस तरह से तैयार किया गया है, जिसमें विशिष्ट दृष्टिकोण से बहुत से सवाल पूछे जाने की जरूरत है। इसे अब लोग नेट न्यूट्रैलिटी कन्सल्टेशन पेपर ऑफ ट्राई के रूप में जानने लगे हैं।



जारी होने के साथ ही इस परामर्श पत्र ने कई बहसों को जन्म दिया। अलग नजरिये से देखें, तो इसमें कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिन्हें अगर लागू किया गया, तो भारतीय नागरिकों और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की ऑनलाइन स्वतंत्रता पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। असल में, नेट न्यूट्रैलिटी एक सिद्धांत है, जो इंटरनेट को एक ऐसा निरपेक्ष मंच बनाने को समर्पित है, जहां सभी कंटेंट और सेवा को अपने प्रचार-प्रसार का समान माहौल मिले।

बेशक अपने देश में अभी नेट तटस्थता को लेकर काफी चर्चाएं हो रही हैं, पर कुछ सामान्य मार्गदर्शक सिद्धांत जरूर होने चाहिए, जो देश में नेट तटस्थता की राह आसान कर सके। इंटरनेट के सभी हितसाधकों को समग्र दृष्टिकोण अपनाने में सक्षम बना सके, इसके लिए कुछ सुझाव ये भी हो सकते हैं- समग्र रूप से इंटरनेट मानव जाति के लिए एक वैश्विक विरासत है। हमें मानव जाति के विकास में योगदान के लिए इंटरनेट की जरूरत है, न कि समाज के भीतर भेदभाव फैलाने के लिए। इसी तरह, इंटरनेट को संरक्षित किए जाने की जरूरत है, क्योंकि यह सार्वजनिक प्रतिमान मंच है, जो विचार-प्रक्रिया के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक रूप में आंकड़े एवं पाठ (चाहे वे ध्वनि, दृश्य या छवि रूप में ही क्यों न हों) के प्रसार, विस्तार और संचार के लिए रचनात्मक एवं नवोन्मेषी दृष्टिकोण अपनाने की अनुमति देता है। नेट तटस्थता से संबंधित किसी भी पहल का इंटरनेट के अंतिम उपयोगकर्ताओं पर कोई नुकसानदेह असर नहीं पड़ना चाहिए। नेट तटस्थता के संदर्भ में उपभोक्ता संरक्षण का मुद्दा संवेदनशील और अहम बन गया है। ऐसे ही नेट तटस्थता का उल्लंघन करने वाली पहल को डिजिटल अमीर और डिजिटल गरीब की पारिस्थितिकी का निर्माण नहीं करना चाहिए, जहां डिजिटल रूप से समृद्ध लोग अपने पैसे की ताकत के बदौलत इंटरनेट पर बेहतर गुणवत्ता की सेवा हासिल कर सकते हैं, जबकि डिजिटल गरीब लोग विभिन्न सेवाओं और योजनाओं से कम भुगतान के कारण बेदखल कर दिए जाते हैं। आज लोगों का जीवन इंटरनेट पर निर्भर है। इंटरनेट तक पहुंच आज लोगों का मौलिक अधिकार है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने के मौलिक अधिकार का हिस्सा है और स्वाभाविक रूप से अनुल्लंघनीय है। केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रियाओं के तहत ही इसमें कटौती की जा सकती है। मूलतः इसका मतलब है कि किसी भी तरह की नेट तटस्थता केवल कानूनी तरीके से आ सकती है, अन्यथा नहीं। नेट तटस्थता से संबंधित जटिल कानूनी, नीतिगत एवं विनियामक विषयों की विस्तार से जांच की जरूरत है, खासकर तब, जब सूचना तकनीकी अधिनियम, 2000 और इसके तहत बनाए गए नियम-कानूनों में नेट निरपेक्षता के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। नेट तटस्थता का उल्लंघन करने वाली योजनाओं को सेवा प्रदाताओं के लिए कानूनी इन्कार या लोगों की ऑनलाइन स्वतंत्रता के, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी शामिल है, उल्लंघन का औजार नहीं बनना चाहिए। नेट तटस्थता के मसले को अगर उचित तरीके से नहीं निपटाया गया, तो यह केंद्र सरकार के डिजिटल इंडिया प्रोग्राम पर भी प्रतिकूल असर डाल सकता है। हमें सावधानीपूर्वक इसके प्रति भी सचेत रहने की जरूरत है कि धारा 66 ए के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित जो जीत मिली, वह नेट निरपेक्षता की बहस में कहीं छूट न जाए। नेट तटस्थता को साधारण इंटरनेट उपभोक्ता के संदर्भ में समझने की जरूरत है। साधारण इंटरनेट उपभोक्ता या मोबाइल उपभोक्ता के बिल में किसी भी तरह की वृद्धि न केवल भारतीय उपभोक्ताओं को आर्थिक नुकसान पहुंचाएगी, बल्कि इंटरनेट नियामक व्यवस्था के प्रति उनके विश्वास पर प्रतिकूल असर डालने के अलावा आगे लोगों के इंटरनेट तक पहुंच बनाने पर भी असर डाल सकती है। ये सुझाव नेट तटस्थता के मुद्दे से निपटने की दिशा में हितसाधकों को रास्ता सुझा सकते हैं।

भारत की प्रगति के लिए नेट न्यूट्रैलिटी महत्वपूर्ण होगी। ऐसी कोई भी पहल, जो इंटरनेट तक पहुंच बनाने के लिए पक्षपातपूर्ण शुल्क की व्यवस्था करती हो, संभवतः डिजिटल भेदभाव पैदा करती है। ऐसी कोई भी कवायद रचनात्मकता और नवोन्मेष में कमी करने के अलावा देश में डिजिटल अभियान के विकास को रोक सकती है।

एक नेटवर्क के रूप में न तो इंटरनेट को बांधकर रखा जा सकता है, और न इसे रखा जाना चाहिए। इसका जन्म भेदभाव बनाए रखने और समृद्ध एवं वंचितों का वर्ग पैदा करने के लिए नहीं हुआ है। इसके बजाय यह रचनात्मकता, नवोन्मेष और ऑनलाइन विकास को प्रोत्साहित करने वाला एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इसलिए बिना सोचे-विचारे जल्दबाजी में कोई फैसला लेना ठीक नहीं होगा।


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